यूँ सजा चाँद के छलका – Yun Saja Chand Ke Chhalka – Asha Bhosle
गायिका की बेमिसाल आवाज़: आशा भोसले
आशा भोसले ने यूँ सजा चाँद के छलका ग़ज़ल में अपनी आवाज़ से जो जादू बिखेरा है, वह दिल को छू जाता है। आशा जी की आवाज़ में जो कोमलता और सजीवता है, उसने इस ग़ज़ल को बेहद खास बना दिया है। उनके गायन में मौजूद भावनात्मक गहराई और सटीकता श्रोताओं को हर शब्द के साथ जोड़ती है। आशा भोसले का गायन इस ग़ज़ल में उनके अनुभव और कुशलता का सजीव उदाहरण है। हर सुर और हर लफ़्ज़ में उनकी गायकी की उत्कृष्टता स्पष्ट झलकती है।
संगीत: ग़ुलाम अली का सजीव संगीत
ग़ुलाम अली की संगीत रचना ने यूँ सजा चाँद के छलका ग़ज़ल को एक अनमोल धरोहर बना दिया है। उनकी संगीत रचनाएँ हमेशा से भावनाओं की गहराई और नज़ाकत को दर्शाती हैं। ग़ुलाम अली ने इस ग़ज़ल के संगीत में गहरे और मधुर स्वर लगाए हैं जो सुनने वालों के दिल को छू जाते हैं। ग़ज़ल की धुनें सरल होते हुए भी इतनी प्रभावशाली हैं कि वे श्रोताओं को एक भावनात्मक यात्रा पर ले जाती हैं। उनके संगीत में जो संयम और संतुलन है, वह इस ग़ज़ल को और भी अधिक विशेष बनाता है।
बोल: फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की शायराना कारीगरी
फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की शायरी इस ग़ज़ल की आत्मा है। उनके शब्दों में जो गहराई और नज़ाकत है, वह इस ग़ज़ल को एक शायराना महफिल में बदल देती है। ‘यूँ सजा चाँद के छलका’ ग़ज़ल के बोल प्यार और जुदाई की भावनाओं को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में व्यक्त करते हैं। फ़ैज़ की शायरी हमेशा दिल को छूने वाली रही है, और इस ग़ज़ल में भी उन्होंने अपने शब्दों के माध्यम से दर्द, प्रेम और उम्मीद को एक साथ पिरोया है।
निष्कर्ष: एक अद्वितीय शायराना अनुभव
‘यूँ सजा चाँद के छलका’ ग़ज़ल संगीत, गायकी और शायरी का एक उत्कृष्ट संगम है। आशा भोसले की बेमिसाल गायकी, ग़ुलाम अली का सजीव संगीत, और फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की गहरी शायरी इस ग़ज़ल को अमर बनाते हैं। यह ग़ज़ल उन भावनाओं को बयां करती है जो शब्दों से परे हैं, और हर सुनने वाले के दिल में एक गहरी छाप छोड़ जाती है।

यूँ सजा चाँद के छलका – Yun Saja Chand Ke Chhalka Song Details
Movie/Album: मिराज-ए-ग़ज़ल (1983)
Music By: ग़ुलाम अली
Lyrics By: फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’
Performed By: आशा भोसले
यूँ सजा चाँद के छलका- Yun Saja Chand Ke Chhalka Lyrics in Hindi
यूँ सजा चाँद के छलका तेरे अंदाज़ का रंग
यूॅं फ़ज़ा महकी कि बदला मेरे हमराज़ का रंग
यूँ सजा चाँद के छलका…
साया-ए-चश्म में हैराॅं रुख़-ए-रौशन का जमाल
सुर्ख़ी-ए-लब में परेशाँ तिरी आवाज़ का रंग
यूॅं फ़ज़ा महकी…
बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब
शीशा-ए-मय में ढले सुबह के आग़ाज़ का रंग
यूॅं फ़ज़ा महकी…
चंग-ओ-नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग
यूॅं फ़ज़ा महकी…
