रात आँखों में ढली – Raat Aankhon Mein Dhali, Jagjit Singh, Ghazal
“Raat Aankhon Mein Dhali” एक ऐसी ग़ज़ल है जो केवल एक दर्द को व्यक्त नहीं करती, बल्कि उसे जीने की संवेदनाओं से भर देती है। जगजीत सिंह की आवाज़ और बशीर बद्र की शायरी मिलकर एक गहरी संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई को उभारती है, जो श्रोता के दिल में घर कर जाती है।

रात आँखों में ढली – Raat Aankhon Mein Dhali Ghazal Credits
- Movie/Album: तुम तो नहीं हो (2005)
- Music : जगजीत सिंह
- Lyrics : बशीर बद्र
- Singer : जगजीत सिंह
रात आँखों में ढली – Raat Aankhon Mein Dhali Ghazal Lyrics
रात आँखों में ढली, पलकों पे जुगनू आए
हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आएरात आँखों में ढली…
बस गई है मेरे एहसास में ये कैसी महक
कोई खुशबू मैं लगाऊँ तेरी खुशबू आए
हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आए
रात आँखों में ढली…
उसने छू कर मुझे पत्थर से फिर इन्सान कियामुद्दतों बाद मेरी आँख में आँसूँ आए
रात आँखों में ढली…
मैंने दिन रात खुदा से ये दुआ माँगी थीकोई आहट ना हो दर पर मेरे जब तू आई
हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आए
रात आँखों में ढली…
